सत्संग आत्मजागरण और जीवन मूल्यों का सशक्त माध्यम: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

जोधपुर। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि सत्संग केवल धार्मिक अनुष्ठानों या पौराणिक कथाओं के श्रवण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मजागरण, नैतिक मूल्यों, आत्मानुशासन और व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति में सत्संग को सर्वोच्च स्थान इसलिए प्राप्त है क्योंकि यह व्यक्ति के विचार, व्यवहार और चरित्र का परिष्कार कर समाज एवं राष्ट्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। राज्यपाल रविवार को सम्बोधि धाम, जोधपुर द्वारा गांधी मैदान में आयोजित 52 दिवसीय चातुर्मास आध्यात्मिक महोत्सव ‘जीने की कला’ प्रवचनमाला एवं लोक कल्याणकारी दिव्य सत्संग कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रसंत ललितप्रभ सागर एवं चंद्रप्रभ सागर का आशीर्वाद लिया और उनके समाजोत्थान तथा आध्यात्मिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार में योगदान की सराहना की।

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जोधपुर। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि सत्संग केवल धार्मिक अनुष्ठानों या पौराणिक कथाओं के श्रवण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मजागरण, नैतिक मूल्यों, आत्मानुशासन और व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति में सत्संग को सर्वोच्च स्थान इसलिए प्राप्त है क्योंकि यह व्यक्ति के विचार, व्यवहार और चरित्र का परिष्कार कर समाज एवं राष्ट्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

राज्यपाल रविवार को सम्बोधि धाम, जोधपुर द्वारा गांधी मैदान में आयोजित 52 दिवसीय चातुर्मास आध्यात्मिक महोत्सव ‘जीने की कला’ प्रवचनमाला एवं लोक कल्याणकारी दिव्य सत्संग कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रसंत ललितप्रभ सागर एवं चंद्रप्रभ सागर का आशीर्वाद लिया और उनके समाजोत्थान तथा आध्यात्मिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार में योगदान की सराहना की।

उन्होंने कहा कि संतों का सान्निध्य जीवन को नई दिशा देता है। धर्म को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखकर जीवन जीने की कला, नैतिकता, मानवीय संवेदनाओं और व्यक्तित्व विकास से जोड़ना भारतीय संत परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने दोनों संतों की हजारों किलोमीटर की पदयात्राओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके माध्यम से समाज में अहिंसा, सद्भाव, आत्मसंयम और मानवीय मूल्यों का संदेश पहुंचा है।

राज्यपाल ने कहा कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ केवल आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान के प्रसार के सशक्त माध्यम भी थे। इसी प्रकार श्रमण परंपरा की पदयात्राएं समाज के साथ निरंतर संवाद स्थापित कर लोकमंगल की भावना को मजबूत करती हैं। उन्होंने सम्बोधि धाम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्संग, साधना और सेवा का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए इसके मानवता, शांति और आत्मविकास के कार्यों की सराहना की।

कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि चातुर्मास केवल संतों के एक स्थान पर विराजमान होने का समय नहीं, बल्कि आत्ममंथन, आत्मसंयम, आत्मपरिवर्तन और आत्मजागरण का महापर्व है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में वर्षा ऋतु को प्रकृति के नवजीवन के साथ-साथ मनुष्य के भीतर ज्ञान, करुणा, विवेक और संयम के जागरण का भी श्रेष्ठ अवसर माना गया है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संतवाणी का लाभ उठाया।

 
 
 
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Author
Rajendra Harsh
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