रानीसागर पर श्रीमाली ब्राह्मणों का पवित्र श्रावणी उपाकर्म

जोधपुर। श्रावण मास की पूर्णिमा के अवसर पर रानीसागर पर श्रीमाली ब्राह्मण समाज की ओर से श्रावणी उपाकर्म का पवित्र वार्षिक संस्कार श्रद्धा और वैदिक परंपराओं के साथ मनाया गया। इस दौरान सरोवर परिसर वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा। कार्यक्रम में यज्ञोपवीत परिवर्तन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। साथ ही श्रावणी उपाकर्म पद्धति पर आधारित नई पुस्तक का विमोचन भी किया गया। 

कार्यक्रम की शुरुआत वर्षभर में जाने-अनजाने हुए पापों के प्रायश्चित के लिए हेमाद्रि संकल्प के साथ हुई। इसके बाद विधि-विधानपूर्वक दशविधि स्नान, तर्पण, गणपति पूजन, पुण्यवाचन और विष्णु पूजन किया गया। श्रावणी उपाकर्म के अंतर्गत सप्तऋषि पूजन एवं तर्पण भी किया गया।

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जोधपुर। श्रावण मास की पूर्णिमा के अवसर पर रानीसागर पर श्रीमाली ब्राह्मण समाज की ओर से श्रावणी उपाकर्म का पवित्र वार्षिक संस्कार श्रद्धा और वैदिक परंपराओं के साथ मनाया गया। इस दौरान सरोवर परिसर वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा। कार्यक्रम में यज्ञोपवीत परिवर्तन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। साथ ही श्रावणी उपाकर्म पद्धति पर आधारित नई पुस्तक का विमोचन भी किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत वर्षभर में जाने-अनजाने हुए पापों के प्रायश्चित के लिए हेमाद्रि संकल्प के साथ हुई। इसके बाद विधि-विधानपूर्वक दशविधि स्नान, तर्पण, गणपति पूजन, पुण्यवाचन और विष्णु पूजन किया गया। श्रावणी उपाकर्म के अंतर्गत सप्तऋषि पूजन एवं तर्पण भी किया गया। इस दौरान कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ ऋषियों का स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।

कार्यक्रम का प्रमुख अनुष्ठान यज्ञोपवीत परिवर्तन रहा। वैदिक मंत्रों के उच्चारण के बीच समाज के सदस्यों ने पुराने जनेऊ का विधिवत त्याग कर नया यज्ञोपवीत धारण किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने धार्मिक परंपराओं और संस्कारों के महत्व को समझते हुए वैदिक रीति-रिवाजों का पालन किया।

इस अवसर पर राजवेदिया पं. सत्यनारायण दवे द्वारा संकलित ‘श्रावणी उपाकर्म पद्धति’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया। समाजजनों ने पुस्तक को श्रावणी उपाकर्म की विधियों और परंपराओं को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

आयोजकों ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म का धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है। ‘उपाकर्म’ का अर्थ शुरुआत या समीप जाना माना जाता है। प्राचीन समय में इसी दिन से गुरुकुलों में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होती थी। वर्तमान में भी यह संस्कार वैदिक परंपराओं और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण का माध्यम बना हुआ है।

कार्यक्रम में पं. बिहारीलाल बोहरा, पं. रमेश बोहरा, गौरेश बोहरा, प्रफुल्ल दवे, दीक्षित बोहरा, मनीष जोशी, रोहित दवे, आशीष दवे, विशाल राज दवे सहित बड़ी संख्या में समाजजन एवं ब्राह्मण उपस्थित रहे।

 
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Author
Rajendra Harsh
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