डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में “विद्धकर्म” विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। इस अकादमिक कार्यक्रम में देशभर से आए आयुर्वेद विशेषज्ञों, चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम का आयोजन मानव संसाधन विकास केंद्र एवं स्नातकोत्तर शल्य तंत्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रोफेसर (वैद्य) गोविंद सहाय शुक्ल ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलगुरु प्रोफेसर वी.एस. जैतावत उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं धन्वंतरि वंदना के साथ हुआ। इस अवसर पर पुणे के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य एवं विद्धकर्म विशेषज्ञ डॉ. अमोल उत्तम बंसोड़े मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने अपने व्याख्यान में विद्धकर्म की मूल अवधारणा, शास्त्रीय संदर्भ, प्रक्रिया-विधि तथा वैज्ञानिक आधार पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कुलगुरु प्रोफेसर गोविंद सहाय शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि आयुर्वेद की पारंपरिक पराशल्य विधाओं का वैज्ञानिक पुनर्स्थापन समय की आवश्यकता है। उन्होंने विद्धकर्म जैसी प्रभावी चिकित्सा पद्धति को शोध एवं प्रशिक्षण के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने पर जोर दिया। वहीं मुख्य अतिथि प्रोफेसर जैतावत ने आयुर्वेद एवं कृषि विश्वविद्यालयों के समन्वय से आमजन की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की बात कही।
डॉ. अमोल उत्तम बंसोड़े ने बताया कि विद्धकर्म विधि जानु संधिशूल (घुटना दर्द), अंस शूल, अवबाहुका (फ्रोजन शोल्डर), गृध्रसी (सायटिका) तथा कटिशूल (कमर दर्द) जैसे रोगों में विशेष रूप से लाभकारी है। उन्होंने इसके संभावित उपयोग राइनाइटिस, बांझपन, पीसीओडी और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकारों में भी बताए।
कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण लाइव डेमो एवं हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण सत्र रहा, जिसमें प्रतिभागियों को सुई प्रवेश की तकनीक, बिंदु चयन, गहराई नियंत्रण एवं पश्चात देखभाल का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
इस अवसर पर उप प्राचार्य प्रो. ए. नीलिमा, शल्य तंत्र विभागाध्यक्ष प्रो. महेंद्र कुमार शर्मा, प्रो. गोविंद प्रसाद गुप्ता, प्रो. राजाराम अग्रवाल सहित अनेक संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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