विद्यार्थियों का नागौर किले का शैक्षणिक भ्रमण

जोधपुर। एमबीएम विश्वविद्यालय, जोधपुर के वास्तुकला एवं नगर नियोजन विभाग के विद्यार्थियों ने हाल ही में ऐतिहासिक एवं स्थापत्य दृष्टि से महत्वपूर्ण नागौर किले का शैक्षणिक भ्रमण किया। इस भ्रमण का उद्देश्य पारंपरिक भारतीय वास्तुकला में प्रयुक्त पैसिव डिज़ाइन तकनीकों एवं सतत निर्माण प्रणालियों का प्रत्यक्ष अध्ययन करना था।

 

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एमबीएम विश्वविद्यालय के वास्तुकला विद्यार्थियों का नागौर किले का शैक्षणिक भ्रमण

जोधपुर। एमबीएम विश्वविद्यालय, जोधपुर के वास्तुकला एवं नगर नियोजन विभाग के विद्यार्थियों ने हाल ही में ऐतिहासिक एवं स्थापत्य दृष्टि से महत्वपूर्ण नागौर किले का शैक्षणिक भ्रमण किया। इस भ्रमण का उद्देश्य पारंपरिक भारतीय वास्तुकला में प्रयुक्त पैसिव डिज़ाइन तकनीकों एवं सतत निर्माण प्रणालियों का प्रत्यक्ष अध्ययन करना था।

विभागाध्यक्ष आर्किटेक्ट राजेश शर्मा ने बताया कि नागौर किला पारंपरिक जलवायु-संवेदनशील वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। भ्रमण के दौरान छात्रों ने किले में विकसित वर्षा जल संचयन प्रणाली का गहन अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि किस प्रकार प्राचीन काल में वर्षाजल को संग्रहित कर लंबे समय तक उपयोग हेतु संरक्षित किया जाता था, जिससे जल संकट की स्थिति में भी किले की आवश्यकताएं पूरी होती थीं।

छात्रों ने किले में मौजूद कूलिंग चैनल सिस्टम का भी अवलोकन किया। यह प्रणाली हवा और जल के संयोजन से प्राकृतिक शीतलन प्रदान करती है, जिससे बिना किसी यांत्रिक उपकरण के भवनों के आंतरिक तापमान को नियंत्रित किया जाता था। आर्किटेक्ट अंशु अग्रवाल ने छात्रों को किले की मोटी पत्थर की दीवारों, उनके थर्मल मास और भवनों के उन्मुखीकरण की विशेषताओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ये दीवारें दिन में गर्मी को अवशोषित कर लेती हैं और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती हैं, जिससे अंदर का वातावरण संतुलित और आरामदायक बना रहता है।

इस शैक्षणिक भ्रमण के दौरान विभाग के प्राध्यापक आर्किटेक्ट हरेंद्र बोहरा, आर्किटेक्ट प्रियंका मेहता एवं आर्किटेक्ट कमलेश कुम्हार ने छात्रों को स्थल पर ही विभिन्न वास्तु तत्वों की व्याख्या करते हुए मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने पारंपरिक वास्तुकला के सिद्धांतों को आधुनिक डिज़ाइन और सतत विकास की अवधारणाओं से जोड़ने पर विशेष बल दिया।

भ्रमण में शामिल छात्रों ने बताया कि इस प्रत्यक्ष अध्ययन से उन्हें यह समझने में सहायता मिली कि ऐतिहासिक इमारतें स्थानीय जलवायु, संसाधनों और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप किस प्रकार डिज़ाइन की जाती थीं। छात्रों के अनुसार यह शैक्षणिक अनुभव न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि भविष्य में ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल वास्तुकला अपनाने के लिए अत्यंत प्रेरणादायक भी सिद्ध हुआ।

 
 
 
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Author
Rajendra Harsh
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