जोधपुर में रावण दहन पर नहीं मनाते जश्न, शोक में रखते हैं सूतक
- Posted on 20 अक्टूबर 2026
- जोधपुर
- By Rajendra Harsh
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जोधपुर। देशभर में विजयादशमी पर रावण दहन के बाद जहां जय श्रीराम के जयकारों और आतिशबाजी के साथ उत्सव मनाया जाता है, वहीं जोधपुर में एक ऐसा समुदाय भी है, जो रावण की मृत्यु पर शोक मनाता है। यहां रावण दहन के बाद जश्न मनाने के बजाय धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है। कुछ परिवार इस अवसर पर सूतक भी रखते हैं। श्रीमाली ब्राह्मण समाज के दवे गोधा ब्राह्मण समुदाय के कुछ लोग खुद को रावण का वंशज मानते हैं। पंडित अजय दवे के अनुसार, जब रावण मंदोदरी से विवाह करने मंडोर आया था, तब दवे गोधा ब्राह्मण भी उसके साथ आए थे और यहीं बस गए थे। इसी मान्यता के चलते समुदाय के कुछ परिवार रावण को अपना पूर्वज मानते हैं। स्थानीय परंपरा में रावण को मंदोदरी के मायके पक्ष से जुड़े रिश्ते के कारण दामाद के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।
जोधपुर। देशभर में विजयादशमी पर रावण दहन के बाद जहां जय श्रीराम के जयकारों और आतिशबाजी के साथ उत्सव मनाया जाता है, वहीं जोधपुर में एक ऐसा समुदाय भी है, जो रावण की मृत्यु पर शोक मनाता है। यहां रावण दहन के बाद जश्न मनाने के बजाय धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है। कुछ परिवार इस अवसर पर सूतक भी रखते हैं।
रावण की पूजा के बाद मनाते हैं शोक
जोधपुर में मेहरानगढ़ किले की तलहटी में किला रोड स्थित अमरनाथ महादेव मंदिर परिसर में रावण का मंदिर बना हुआ है। विजयादशमी के दिन यहां रावण की प्रतिमा का अभिषेक कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। शाम को सूरज ढलने के बाद रावण की मृत्यु पर शोक मनाने की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान समुदाय के लोग स्नान कर धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। कुछ लोग पिंडदान की परंपरा भी निभाते हैं।
रावण को मानते हैं अपना पूर्वज
श्रीमाली ब्राह्मण समाज के दवे गोधा ब्राह्मण समुदाय के कुछ लोग खुद को रावण का वंशज मानते हैं। पंडित अजय दवे के अनुसार, जब रावण मंदोदरी से विवाह करने मंडोर आया था, तब दवे गोधा ब्राह्मण भी उसके साथ आए थे और यहीं बस गए थे। इसी मान्यता के चलते समुदाय के कुछ परिवार रावण को अपना पूर्वज मानते हैं। स्थानीय परंपरा में रावण को मंदोदरी के मायके पक्ष से जुड़े रिश्ते के कारण दामाद के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।
मंदिर धोकर लगाते हैं खीर-पूड़ी का भोग
परंपरा के अनुसार, रावण दहन के बाद मंदिर परिसर की सफाई कर उसे धोया जाता है। इसके बाद विशेष आरती की जाती है और खीर-पूड़ी का भोग लगाया जाता है। समुदाय के कुछ परिवार रावण की मृत्यु को शोक का अवसर मानते हुए घरों में सूतक रखते हैं। इस अनूठी परंपरा के कारण जोधपुर में विजयादशमी का स्वरूप देश के अन्य हिस्सों से अलग दिखाई देता है। यहां यह पर्व धार्मिक आस्था, पारिवारिक मान्यताओं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के निर्वहन का प्रतीक है।
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