दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि चादर महोत्सवः
- Posted on 24 जनवरी 2026
- जोधपुर
- By Rajendra Harsh
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जोधपुर, 24 जनवरी। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ परंपरा के प्रथम दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि की स्मृति में आगामी 6 से 8 मार्च 2026 को जैसलमेर में आयोजित होने जा रहा चादर महोत्सव श्रद्वा, इतिहास और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का एक ऐतिहासिक आयोजन होगा।
जोधपुर, 24 जनवरी। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ परंपरा के प्रथम दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि की स्मृति में आगामी 6 से 8 मार्च 2026 को जैसलमेर में आयोजित होने जा रहा चादर महोत्सव श्रद्वा, इतिहास और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का एक ऐतिहासिक आयोजन होगा। यह जानकारी आज जोधपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस समिति के अध्यक्ष महाराष्ट्र के कौशल विकास एवं उधमिता मन्त्री मगल प्रभात लोढ़ा, सयोजक सघवी तेजराज गुलेच्छा, समायोजन महेन्द्र सिंह भन्साली
ने दी। मीडिया प्रभारी दीपक कुमार सिंघवी ने बताया कि
महोत्सव परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज, अन्य पूज्य आचार्यों, शताधिक जैन साधु-साध्वियों तथा वैदिक परंपरा के लगभग 200 संतों के सान्निध्य में संपन्न होगा। देश-विदेश से 15 से 20 हजार श्रद्वालुओं की सहभागिता अपेक्षित है।
6 मार्च को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघ चालक श्री मोहनराव भागवत जी इस ऐतिहासिक आयोजन का उद्घाटन करेंगे। 7 मार्च को भव्य वरघोड़े के साथ चादर को महोत्सव स्थल पर लाया जाएगा, जहाँ श्रद्वालुओं द्वारा विधिपूर्वक अभिषेक किया जाएगा। इसी अवसर पर संपूर्ण विश्व में 1 करोड़ 8 लाख भक्तों द्वारा सामूहिक दादागुरू इकतीसा का पाठ किया जाएगा। 8 मार्च को पूज्य उपाध्याय श्री महेन्द्रसागर जी महाराज को आचार्य पद प्रदान किया जाएगा।
महोत्सव के अंतर्गत "भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता एवं सामाजिक समरसता में दादागुरू परंपरा का योगदान" विषय पर एक विद्वत संगोष्ठी का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें देशभर के विद्वान, शोधार्थी और सामाजिक चिंतक सहभागिता करेंगे।
प्रवक्ताओं ने बताया कि यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दादागुरूदेव श्री जिनदत्तसूरि की साधना, करूणा और सामाजिक संतुलन की परंपरा को समर्पित एक जीवंत सांस्कृतिक पर्व है।
दादागुरू के स्वर्गवास के पश्चात् उनके अग्नि संस्कार के समय उनकी चादर एवं साधना-सामग्री का अग्नि से अप्रभावित रहना उनकी उच्च आध्यात्मिक साधना और आत्मिक तेज का प्रतीक माना जाता है। यही चादर आज श्रद्धालुओं के लिए विघ्नहर्ता और कल्याणकारी आस्था का केंद्र बनी हुई है।
ऐतिहासिक रूप से यह चादर अजमेर से अन्हिलपुर पाटन (गुजरात) ले जाई गई थी। लगभग 150 वर्ष पूर्व जैसलमेर में महामारी फैलने पर जैसलमेर के महारावल के निवेदन पर यह चादर जैसलमेर लाई गई, जिसके बाद से यह जैसलमेर के ज्ञान भंडार में सुरक्षित संरक्षित है। दादागुरू के स्वर्गवास के 871 वर्ष पश्चात प्रथम बार इस चादर का विधिवत अभिषेक जैसलमेर में किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि (11-12वीं शताब्दी)
केवल जैन आचार्य ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकात्मता और नैतिक पुनर्निर्माण के प्रमुख स्तंभ थे। राजस्थान और गुजरात के सामाजिक जीवन में उनका स्थान वही रहा है, जो अद्वैत परंपरा में आदि शंकराचार्य और गुजरात में आचार्य हेमचंद्र का माना जाता है।
अजमेर के चौहान शासक अर्णोराज सहित अनेक राजपूत शासक उनके प्रति श्रद्धावान थे। उनके उपदेशों ने क्षत्रिय समाज में संयम, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ किया। साथ ही उन्होंने समाज के वंचित और हाशिये पर खड़े वर्गों को भी सांस्कृतिक सम्मान और नैतिक संरक्षण प्रदान किया।
देश-विदेश में फैली हजारों दादावाड़ियाँ आज भी दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि की विरासत की साक्षी हैं, जहाँ लाखों श्रद्वालु दर्शन कर अपने को धन्य मानते है। चादर महोत्सव इसी जीवित परंपरा का एक ऐतिहासिक और प्रेरक उद्घोष है।
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