‘फगला घुडला’ परंपरा 40 साल से अविच्छिन्न

जोधपुर। शहर की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने वाली जीनगर पंचायत की ‘फगला घुडला’ परंपरा पिछले 40 वर्षों से निरंतर चल रही है। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, लोक आस्था और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक हस्तांतरण का सशक्त माध्यम बन चुका है।

 

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जोधपुर। शहर की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने वाली जीनगर पंचायत की ‘फगला घुडला’ परंपरा पिछले 40 वर्षों से निरंतर चल रही है। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, लोक आस्था और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक हस्तांतरण का सशक्त माध्यम बन चुका है।

इस परंपरा की शुरुआत स्वर्गीय मैनाबाई चौहान ने की थी, जिसे आज समाज की महिलाएँ पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रही हैं। बैनसाबाई शांति चितारा, सीता सांखला, गीता सांखला, तारा सांखला, जमना चौहान, शांति सोलंकी, उषा डाबी, मंजू गोयल, वैजयंती माला, छोटी चितारा, ललिता चौहान, धनीबाई और निर्मला गोयल जैसी महिलाओं का इसमें विशेष योगदान है।

गणगौर पर्व के दौरान शुक्ल पक्ष की तृतीया से लेकर नवमी तक प्रतिदिन गवर माता, इसर (भगवान शिव) और भाया (गणेश जी) की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान पारंपरिक गीत, लोकनृत्य और रीति-रिवाजों के माध्यम से उत्सव का वातावरण पूरे क्षेत्र में छा जाता है। महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित होकर सामूहिक रूप से पूजा करती हैं, जिससे सामाजिक समरसता का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है।

इस आयोजन का चरम ‘भौलावनी’ के दिन देखने को मिलता है, जब माँ गणगौर को राज-दरबार की गवर के साथ रानीसर तालाब ले जाया जाता है। यहां पर ‘पानी पिलाने’ की पारंपरिक रस्म निभाई जाती है, जो इस पूरे उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक क्षण होता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, ‘फगला घुडला’ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सामुदायिक स्मृति का वार्षिक नवीकरण है। हर वर्ष इस आयोजन के माध्यम से परंपराएँ दोहराई जाती हैं, नई पीढ़ी को संस्कार दिए जाते हैं और सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं।

लगातार चार दशकों से बिना किसी व्यवधान के चल रही यह परंपरा जीनगर समाज की सांस्कृतिक चेतना और एकजुटता का जीवंत उदाहरण बनी हुई है।

 
 
 
 
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Author
Rajendra Harsh
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