राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ द्वारा दीक्षार्थी
- Posted on 5 अप्रैल 2026
- सामान्य समाचार
- By Rajendra Harsh
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जोधपुर, 4 अप्रैल। राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि वर्तमान युग में जैन दीक्षा अंगीकार करना दुनिया का आठवां आश्चर्य है। आज के युग में जिस तरह से उच्च शिक्षा प्राप्त, अति संपन्न और उच्च वर्ग के लड़के और लड़कियां दीक्षा ले रहे हैं
राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ द्वारा दीक्षार्थी आगम गुलेच्छा का संबोधि धाम में विशेष अभिनंदन
जोधपुर, 4 अप्रैल। राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि वर्तमान युग में जैन दीक्षा अंगीकार करना दुनिया का आठवां आश्चर्य है। आज के युग में जिस तरह से उच्च शिक्षा प्राप्त, अति संपन्न और उच्च वर्ग के लड़के और लड़कियां दीक्षा ले रहे हैं, वह जैन धर्म के लिए बहुत गौरव की बात है,मात्र 13 वर्ष की उम्र में दीक्षार्थी आगम गुलेच्छा द्वारा केरियर बनाने की बजाय आत्म कल्याण के मार्ग पर कदम बढ़ाना सबके लिए मिसाल है। छोटी उम्र में दीक्षा लेकर इंसान न केवल खुद का कल्याण करता है वरन समाज, कल्याण और देश के आध्यात्मिक उत्थान में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका समर्पित करता है।
संत प्रवर चंद्र प्रभ सागर जी महाराज शनिवार को संबोधि धाम, कायलाना रोड़ पर आयोजित दीक्षार्थी अभिनंदन समारोह में श्रद्धालु भाई बहनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जैसे हाथी शक्तिशाली होते हुए भी छोटी सी लोहे की जंजीर से बंधा हुआ रहता है, वैसे ही हर इंसान मोह माया की जंजीरों से बंधा हुआ है, ऐसी स्थिति में वे लोग बड़े सौभाग्यशाली होते हैं जो इस जंजीर को तोड़कर वैराग्य और संयम की ओर अपने कदम बढ़ा देते हैं।
उन्होंने कहा कि अगर आप संसार नहीं छोड़ सकते तो कोई बात नहीं कम से कम छोटे-छोटे व्रत और नियम लेकर भी आत्म कल्याण कर सकते हैं, उन्होंने श्रद्धालुओं को भोजन में झूठा नहीं छोड़ने, सप्ताह में एक दिन इंटरनेट का त्याग करने, नशे का त्याग करने, प्रतिदिन एक घंटे की सामायिक साधना करने और धर्म की एक गाथा प्रतिदिन याद करने की प्रेरणा दी। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रतिदिन एक लाइन धर्म सूत्र याद करने का संकल्प लिया।
इस अवसर पर संत ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि जब हमारे जीवन में एक साथ हजार जन्मों का पुण्य संचित होता है, तब इंसान को दीक्षा का मार्ग मिल पाता है। हर इंसान को दीक्षा लेने के भाव जरूर रखना चाहिए, दीक्षा ना ले सके तो दीक्षा लेने वालों की अनुमोदन करनी चाहिए, साधु संतों की सेवा करनी चाहिए और धर्म के मार्ग को फैलाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए।
इस दौरान डॉ मुनि शांति प्रिय सागर महाराज ने कहा कि यह दुनिया बड़ी विचित्र है यहां फूल में भी कीड़े पाए जाते हैं और पत्थर में भी हीरे पाए जाते हैं। जो भोग का रास्ता छोड़ त्याग और तप का रास्ता अपनाते हैं वे ही नर एक दिन नारायण कहलाए जाते हैं।
इस अवसर पर संबोधि धाम के अध्यक्ष अशोक पारख, महासचिव देवेंद्र गैलड़ा, समारोह के आयोजक चंपालाल शकुंतला गुलेच्छा, शहर कांग्रेस अध्यक्ष ओंकार वर्मा ने भी दीक्षार्थी की अनुमोदना में अपने विचार रखें। इस अवसर पर संबोधि धाम ट्रस्ट मंडल और नगर वासियों द्वारा दीक्षार्थी का तिलक और माला द्वारा अभिनंदन किया गया।
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